सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बबूल का फूल

बबूल     जो    मेरी    छत    के

किनारे    सटकर    छतरी   सा   गुल्म

लगाये   आ    खड़ा   है ।

उसकी   डाली   में    वासंती   मौसम 

ने   दी    है    आहट    उसकी   कली 

कच्चे    धनियों    के    बीजों   की

आपस    में    जुड़ी    लंबी    कतार

उसके    फूल    शहतूत    फल   से 

कुछ    कुछ    लम्बे     दिखते   अपार

झुरमुट    मंजरी    में    पराग   भरा   

नन्हीं    पंखुड़ियाँ     उसमें      झाँके 

हमको    चुपचाप  

हवाओं    संग    दूर    तलक ...  बहती  जाए 

अपना    पराग   पंखुड़ी    वो     

नीचे    जमीन   पर    गिराए  ...!

फूल    लगे    है    सुंदर   पर

काँटों    से    भरा   है  ,

फिर    भी    चिड़िया   करती   है 

उनमें    अपना    बसेरा  

ये   जगत    और    जीवन   भी    कुछ 

ऐसा    ही   है    जहाँ    फूल   और   काँटे 

आपस   में    अलग    नहीं    एक   है

जिसमें    जीव   राजी  -   खुशी    

हर    इक    पल    को    जीता   है ।

हर    मुश्किल    को   मिलकर    सहता   है  ।

●  लिख देता ये कथा कौन


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध

रामवृक्ष बेनीपुरी गेहूँ बनाम गुलाब निबंध गेहूँ हम खाते हैं, गुलाब सूँघते हैं। एक से शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से मानस तृप्‍त होता है। गेहूँ बड़ा या गुलाब? हम क्‍या चाहते हैं - पुष्‍ट शरीर या तृप्‍त मानस? या पुष्‍ट शरीर पर तृप्‍त मानस? जब मानव पृथ्‍वी पर आया, भूख लेकर। क्षुधा, क्षुधा, पिपासा, पिपासा। क्‍या खाए, क्‍या पिए? माँ के स्‍तनों को निचोड़ा, वृक्षों को झकझोरा, कीट-पतंग, पशु-पक्षी - कुछ न छुट पाए उससे !

दिवाली की रौनक तभी सफल बने

सर्द दिनों की रुहानी आहट लिए मौसम का रुख बदला है सिमटा - सिमटा दिन  गुलाबी ठंडक लिए  सूरज आसमाँ के पट पर खिलने लगे गुलाब  मंजरी पर पुलकित पुष्प

अजन्ता - भगवतशरण उपाध्याय रचित निबन्ध

जिन्दगी  को  मौत  के  पंजों  से  मुक्त  कर  उसे  अमर  बनाने  के  लिए  आदमी  ने  पहाड़  काटा  है । किस  तरह  इंसान  की खूबियों  की  कहानी  सदियों  बाद  आने  वाली  पीढ़ी  तक  पहुँचायी  जाये , इसके  लिए  आदमी  ने  कितने  ही  उपाय  सोचे  और  किये । उसने  चट्टानों  पर  अपने  संदेश  खोदे , ताड़ों  से  ऊँचे  धातुओं  से  चिकने पत्थर  के  खम्भे  खड़े  किये , ताँबे  और  पीतल  के  पत्थरों  पर  अक्षरों  के  मोती  बिखेरे  और  उसके  जीवन - मरण  की  कहानी  सदियों  के  उतारों  पर  सरकती  चली आयी , चली  आ  रही  है , जो  आज  हमारी  अमानत - विरासत  बन  गयी  है ।       इन्हीं  उपायों...

जन्मदिन मुबारक हो प्रियंका

सोचती हूँ  कि फिर एक बार  छोटी हो जाओ  नहीं  बनना बड़ा  , हमारा बचपन  ही  था भला पर  जिस  गाड़ी  पर  हम  बैठे  है  रुकती  ही  नहीं मुझे  मुड़कर  देख  मुस्काना  होता  है  यादों  की  चाँदनी  रात  में टिमटिमाते  सितारों  को देखना होता है कैसे होती थी सुबह  स्कूल  जाने  को  सुहानी  सुबह

जब सबकुछ है

जब सबकुछ है , तो उदासी का ये रुप थोड़ा - थोड़ा परेशान करता  मैं नहीं जानती , क्या बात है जो मन व्यथित बार - बार उदोलित होता है  दिशाएँ प्रवर दाहक चिंगारियों की छटकन आज भी कहाँ इस अंतर्द्वन्द्व का अंत हुआ है आज भी अपने उत्तर का याचक रहा प्रश्न

चलो देख आए

हवाओं   से   दूर   नीलगगन   के  साथ  समंदर   का   तरंगायित   दर्पण हरियाली   का   तृण -  तृण लहराता  धरा   के   आंगन  में उत्सव   के  साथ  सावन  की  सौगात  बारिश   में   झूमता -  गाता   बालदल कागज   की    कश्ती    बनाता    और

पीले पते का स्वप्न था

क्षीण   होती    दुर्बल    काया   और  टूटकर   अलग    होता   कोई  पीला   पता    शाख    से मिलेगा    फिर    अपनी     माटी    से विलीन    हो     जायेगा    इन    पंचतत्वों   में जो   सदा   शाश्वत    है   ,    कहो   अब   क्या    दुःख    है  ? आनंद   जीवन    के  ।

जिसमें मैं बंधी बँधकर जो दीप बनी

वह बिंब जिसमें मैं बँधी , बँधकर भी स्वतंत्र सदा  आत्मरुप निर्बंध रही , वही सच्चा बंधन था जिसे मैंने कभी तोड़ा नहीं  जिसका मोह मैंने कभी छोड़ा नहीं आँधियों की झंझा में भी उर में जलता रहा विश्वास का दीप अखंड

तमाशा

अम्बर सा रंग , धरती मेरी धानी  सागर का बहता पानी ,  देती मोती सपनों को आकार कोरे मन की ये कोरी सी कहानी कहता क्या रंग , कहता है क्या पानी उड़ने की जो दिल - ए - तमन्ना    ये मन ने है ठानी 

जनपथ बहुराती

संकेत संकेतक कभी शुभ समाचार की कभी किसी अनहोनी अनिष्ट की दोनों ही रहस्य भविष्य के गर्भ में छिपे है जिसको उस त्रिकालदर्शी के सिवा मैंने क्या किसी ने भी नहीं देखा , तो सुख- दुख के तराजू बराबर है दिन के बाद रात, रात के बाद दिन कोई बाधा नहीं , फिर अस्वीकार कैसा